हमारी सनातन परंपरा में संतों ने कभी शास्त्रों की तर्जनी से, तो कभी साधारण भाषा के फूलवाक्य से हमें जीवन का सार समझाया है। उनमें से एक ऐसा ही अमूल्य दोहा है:
“नर नारायण रूप हैं, तू मति जाने देह।
जो समझे तो समझ ले, खलक पलक में खेह।।”
आइए इसे एक साधारण मनुष्य की आंखों से देखें और महसूस करें।
1. “नर” और “नारायण” एक ही सत्य के दो पहलू
नर (मनुष्य)
हम हर दिन अपना शरीर देखते हैं, उसे पहचानते हैं, और इसी से अपनी पूरी पहचान जोड़ लेते हैं: “मैं यह हूं, जो दिखता हूं।”
नारायण (ईश्वर)
प्राचीन स्मृतियों में कहा गया है कि नारायण, यानी विष्णु, समस्त सृष्टि के पालक हैं। लेकिन संतों ने हमें एक बड़ी बात बताई: यह नारायण हम में ही रहता है।
उपनिषदों का उद्घोष “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ही ब्रह्म हूं) इसी भाव का प्रतिपादन है।
जब हम पहचानते हैं कि जो भीतर चमक रहा है, वो केवल इस देह का नहीं, उस अविनाशी ऊर्जा का अंश है, तब हमारी दृष्टि बदल जाती है।
2. देह नहीं, आत्मा अमर है
हमारी देह भौतिक तत्वों से बनी है—मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु, आकाश। यह सब नश्वर है, एक दिन भूमि में विलीन हो जाएगा।
पर आत्मा? वह एक प्रकाश-सी अनंत ऊर्जा है, जो नए-नए शरीरों के आवरण धारण करती चलती है:
“वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।”
जैसे हम पुराने कपड़े छोड़ नए पहन लेते हैं, वैसे ही आत्मा भी देहें बदलती रहती है।
इसलिए जब हम केवल देह को ही अपनी असली पहचान मानते हैं, तो एक बड़ा भ्रम पाल लेते हैं।
3. क्षणभंगुर संसार की चाल
दोहे का तीसरा भाग—“खलक पलक में खेह”—हमें याद दिलाता है कि यह सारा जगत कितनी तेजी से बदलता है।
खलक = सृष्टि का समग्र रूप
पलक = पलक झपकने का समय
खेह = धूल या राख
मतलब, यह पूरा संसार एक झपकी में धूल बन सकता है। इसे समझकर ही हम मोह-माया के जाल से बच सकते हैं।
4. मोह का सबसे बड़ा जाल
महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था: “दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?”
युधिष्ठिर ने जवाब दिया:
“हर रोज़ लोग मरते हैं, फिर भी ज़िंदा लोग सोचते हैं कि वो कभी नहीं मरेंगे।”
यही वह जाल है जिसमें हम उलझ जाते हैं—कल्पना करना कि हमारा शरीर स्थायी है, जबकि उसकी नश्वरता आँखों के सामने है।
5. जीवन का असली लक्ष्य: आत्मज्ञान
इस दोहे का सार साफ़ है:
- देह को ही सम्पूर्ण न समझें
- आत्मा ही आपकी सच्ची पहचान है
- यह संसार क्षणिक है, जल्दी ही बदल जाता है
- मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मा में रहने वाले ईश्वर को पहचानें
- जिसने इस सत्य को आत्मसात कर लिया, उसने जन्म-मरण के भय से खुद को मुक्त कर लिया।
निष्कर्ष
“नर नारायण रूप हैं”—यह प्रण हमारे भीतर की दिव्यता की गूँज है।
अगर हम इस आवाज़ को सुन लें, तो अपने सीमित शरीर से उठकर अनंत आत्मा तक की यात्रा कर सकते हैं।
